meri Maa

5 जुलाई, 2008 ये मनहूस दिन मै कभी नहीं भूल सकती. आज के दिन ही मेरी माँ को दुर्भाग्य के क्रूर हाथों ने हमसे हमेशा के लिए छीन लिया और वो मुझे एक बहोत बड़ी गिल्ट देकर चली गई जो आज भी फांस बनकर मेरे अंदर जीवित हैं. ये 2008 की बात हैं.

मै उन दिनों उत्तराखण्ड प्रशासन अकादमी मे कार्य कर रही थी. उन दिनो मै जेंडर की एक बड़ी परियोजना ज़िसका नाम स्वयांसिद्धा था देख रही थी ज़िसमे स्वयं सहायता समूहों द्वारा महिलाओं को आर्थिक रुप सशक्त करना था. 5 जनपदों के समूहों का प्रशिक्षण व मूल्यांकन होना था. पूरा ट्रेनिंग मटेरियल तैयार होना था. एक बड़ी ज़िम्मेदारी थी.

निर्णय लिया गया हम खुद ही मटेरियल बनाएंगे. मुझे स्वयं सहायता की पूरी किताब बनाने और ट्रैनिंग प्रबन्धन क्लास लेने आदी का कम दिया गया. किताब बनाने के लिए काफी मेहनत करनी थी ताकि उत्तम प्रशिक्षण दे सके क्योंकि वो ट्रीनेंग परियोजना के अंतिम चरण मै मिली थी वो समूहों की निरंतरता सुनिश्चित होनी थी.

कार्य के प्रति मेरी निष्ठा और कठोर परिश्रम मुझे कार्यालय का कार्य घर ले जाने को मजबूर कर देता था. मै किताब बनाने का का घर पर भी करने लगी. शाम को घर पहुचने मां लगभग 7 बज जाते थे कभी ज्याफ भी. फिर भी मै कम घर ले जाती ताकि जल्दी एक कम. पूरा हो तो अगला कम पूरा कर लू . चाय पीकर मै फिर लिखने बैठ जाती. हम घर मे 5 लोग मेरे माँ फिताजी मै और छोटी बहन और भाई रहते थे. मेरी मा कई बार मेरे पास आती और बोलती गीतु मेरी एक बात सुन और मै बोलती इजा अभी बहुत कम हैं ये किताब पूरी करनी है फिर बात करती हूँ. ना जाने क्या कहना चाह रही थी. ये गिल्ट आज भी जीवित हैं काश मैने एक बार सुन लिया होता ख्या पता क्या कहना चाह रही थी. काश..

3 जुलाई से प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू होने थे. हम सब तैयारी मे लगे थे. 2 जुलाई को मै घर से निकली सब कुछ ठीक तगा. मेरी मा ने मुझे लंच बॉक्स मेरे हाथ मै दिया. लगभग 11 बजे भाई का कॉल आया की इजा की ताबियत अचानक खराब हो गई हैं एक हाथ कम नहीं कर रहा टू गाड़ी बुक कराकर ले आ अस्पताल जाना होगा. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या हो गया. बाहर तेज बारिश हो रही थी. मैने एक गाड़ी बुक की और घर की तरफ भागी. घर जाकर देखा वो बिस्तर पर बैठी थी और कह रही थी देख ये हाथ काम ही नही का रहा मै रसोई साफ कर रही थी पता नही क्या हुआ. हम सब ने बोला ठीक हो जायेगा अस्पताल चलते हैं.

वो तैयार हो गई चलने को और मुझसे बोली गीतु मेरी नई वाली साडी जो तेरी दीदी लाई थी और नया स्वेटर भी निकल दे वो पहनुगी और वो चप्पल भी निकल दे. मैंने बोला ईजा अस्पताल जा रहे हैं नये कपड़े बाद मे पहन लेना मुझे नही पता था वो दिन उसका अंतिम दिन था उस घर मे. खैर मैंने स्वेटर और चप्पल तो दे दी पर साडी न देने का अफसोस आज भी है. उसने अपना चस्मा भी मागा वो भी मैंने दिया. बाद मे समझ आया कि उसे अहसास हो गया था की अब यह वापस नही आना है. बहुत ही पवित्र और सुलझी महिला थी वो.

काल तो जैसे उस दिन सिर पर सवार था. तेज बारिश और तेज हो रही थी. नैनीताल मे घरौं गाडी मुश्किल से पहुचती हैं हमारे घर से भी गाड़ी के लिए थोड़ा उप्पर चढ़कर जाना होता था इसलिए गाड़ी तक लाने मे दिक्कत हुई. वो एक परलीसेस का अटेक था जो गाड़ी मे पहुँचने तक अपना असर दिखा चुका था. हमारी माता जी बेहोश ही चुकी थी.

सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा से पहली बार सामना हुआ. नैनीताल का एकमात्र अस्पताल बी डी पांडे जो हमेशा बीमार को हल्द्वानी . बरेली या दिल्ली रेफर कर देता हैं वही किया हल्द्वानी भेज दिया. समय तेजी से भाग रहा था . सुशीला तिवारी अस्पताल की हालत और खराब वहाँ मरीज को ले जाने के लिए इस्टेचर तक नही मिला. ना कोई वार्डबॉय. खुद ही इस्टेचर ढुढा मदर को उसमे लिटाया तो पता चला सिटी ईसकेंन् मशीन ही खराब है. आनन् फ़ाननं मे एक निजी अस्पताल मे लाये तो वो डॉ विदेश गए थे जो बेस्ट डॉक्टर थे. फिर अगले मे लाये उसने बोला सिटी इस्कैंन् कराओ जी नैनीताल रोड पर है. लौट कर फिर वही नैनीताल रोड. सिटी इस्कैंन् मे center clotting निकली. ऐसे पूरे 4 घण्डे हम सिर्फ दौड़ते रहे. अंत मे माँ को ICU मे डाल दिया गया एक मोटी रकम के साथ. ना वहा कोई specialist ना अच्छा डॉ था. हमे कहा गया कि बरेली से एक्सपर्ट आयेगा.

पूरी रात आखों मे कट गई. रास्तेभर participants के call आते रहे क्योकि उनके पास मेरा ही नंबर था. रात के 10 बजे तक भी ऑफिस के लोगों से बात होती रही. भाई लोगो को सूचना हुई वो सुबह पहुँचे.

दूसरे दिन डॉ आया इलाज किया पर रात तक कुछ नही समझ आया. फिर पता चला की साईं अस्पताल के डॉ विदेश से आ गए हैं. हमने अस्पताल बदलने की बात की तो निज़ी अस्पताल का हाल देखिये वो डिस्चार्ज ही नही कर रहे. बहुत मुश्किल से एक अच्छी खासी रकम लेकर मरीज को छोड़ा गया. दूसरे अस्पताल मे ICU ही नहीं पर डॉ बहुत प्रसिद्ध था. फिर से एक बड़ी रकम के साथ अस्पताल मे भर्ती हुई. शायद उन्हे पता था ये बचेंगी नही लेकिन हमे इमोशनल ब्लैकमेल कर ओपरेशन हुआ. निज़ी अस्पताल वालों को पता है कि परिवार वाले मरीज को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकतें हैं बस इसी का फायदा उठाया जाता है.

4 जुलाई को ओपरेशन किया गया. मुझे फिर ऑफिस जाना था. दूसरा प्रशिक्षण शुरू होना था सो मैंने सोचा भी थोड़ा काम करके कल फिर आ जाऊंगी और ये ही सबसे बड़ी गलती थी मेरी. दूसरे दिन सुबह ही हमारी माँ हमको छोड़ कर चली गई. हमने पिताजी को बिना बोले चुपचाप घुटते देखा. पहले जमाने का प्रेम आज के जमाने जैसा नही होता था. एक खामोश प्रेम खल्लास पवित्र. जब भी पिताजी बोलते तु अपना धयान नही रखती मैं चला जाऊंगा तब पता चलेगा तब माँ हमेशा हसते हुए बोलती तुमसे से पहले ही चली जाऊंगी मै जैसे उसे पता था पहले से.

उसके जाने के दिन जो भीड़ उमडी थी हमारे घर मे वो उसके पुरे जीवन की कहानी कह गई. कितना प्रेम था आपस मे उन दिनों. हर की आँख मे पानी था. उसके जाने के इतने सालों बाद भी जब वो लोग मिलतें हैं तो मेरी मा की बड़ी बिंदी उसकी मुस्कान के साथ उसके द्वारा किये गए सोशल कार्यों को गिनाते हैं. वो पूरे मूहल्ले के बच्चो ताईजी थी किसी की भाभी किसी की चाची और पता नही क्या क्या. हमारे दोस्तों की तो वो इजा ही थी. नज़र उतारने से लेकर पेटदर्द सिरदर्द अपच जपीलिया जैसी कितनी बीमारियो की वो बिना MBBS किये डॉ थी. पूरे पड़ोस मे किसी भी फंक्शन की वो जान थी. कुमाउंगी खाना और सिंगल जो शगुन मे बनते हैं expertise थी उसके पास

13 वें दिन सब चले गए भाई बहिन रिश्तेदार. रह गए हम 4 पिताजी छोटा भाई और बहन. उस दिन भी मैंने कुछ देर के लिए ऑफिस जाकर फील्ड विजिट के लिए प्रतिभागीयो को विदा किया. ये कार्य के प्रति निष्ठा मुझे विरासत मे मिली है. एक साल तक मन ये मानने को तैयार ही नही की इजा नही है. ऑफिस से घर जाते लगता कि बाहर खड़ी इंतजार का रही होगी.

लेकिन सत्य को कुबुलना और सत्य को जीना यही दुनिया का उसूल है पर मा बाप तो सिर्फ शरीर छोड़ते है उनकी आत्मा बच्चो के पास होती है हमेशा.

आज 16 साल हो गए और वो मंजर अभी तक मेरी आखों मे है. काश हमारे सरकारी अस्पताल अच्छी दशा होती तो वो जो 4 se 5 घँटे हम मरीज को लेकर घूमते रहे तो वो शायद आज हमारे साथ होती काश वो injuction जो immediate लगाया जाता है वो लग गया होता. काश निजी अस्पताल मे लूट की जगह अच्छे डॉ होते. काश काश काश…….. ये काश पता नही कितने लोगो की लाइफ ले जाता है. चिंतनीय है……

जीवन दर्पण…… एक सच्ची कहानी

जीवन में अच्छी शुरुआत कभी भी किसी भी उम्र में की जा सकती है। उसके लिए एक मोड़ का आ जाना, जो हमें ट्रिगर कर दे या जिंदगी किसी ऐसे से मिलवा दे जो हमारी छुपी प्रतिभा को निखारने में मील का पत्थर साबित हो, यह एक संयोग ही होता है। मैं यात्राएं बहुत करती हूं कभी ऑफिशियल और कभी पर्सनल। इन्हीं यात्राओं में एक ऐसी यात्रा है जो स्मरणीय है मेरे लिए और इस यात्रा में जो मुझे मिला उनके लिए मोटिवेशनल थी, ऐसा वह मुझे आज भी बोलती है।

यह यात्रा 2016 की रही होगी। मुझे अपने कार्यालय की ओर से एक प्रेजेंटेशन हेतु लखनऊ जाना था। प्रेजेंटेशन पंचायती राज निदेशालय लखनऊ में था। खैर! प्रजेंटेशन अच्छा रहा। मुझे शाम को लौटाना था। रात को 1:00 बजे की ट्रेन हावड़ा एक्सप्रेस। जो हावड़ा पश्चिम बंगाल से चलकर 1:00 बजे लखनऊ चारबाग स्टेशन में पहुंचती थी और सुबह 9:30 तक हल्द्वानी। ट्रेन काफी लेट थी। जैसे ही ट्रेन पहुंची सभी यात्रियों ने तुरंत ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़ लगाई। मैं भी ट्रेन में चढ़ी और अपनी सीट ली। ट्रेन लेट थी और नींद का खुमार था इसलिए अपनी सीट ली और चादर बिछाने लगी। क्योंकि टिकट तत्काल में ली थी, साइड की ऊपर वाली बर्थ मिली। तभी एक सम्भ्रांत महिला मेरी वाली बोगी में चढ़ी। मुस्कुराकर उन्होंने बोला, “आपकी चादर काफी नीचे आ रही है।” उनकी बर्थ नीचे वाली थी। उनकी मुस्कुराहट में कुछ ऐसा आकर्षण था जो सबसे अलग था। मैंने मुस्कुरा कर उनका धन्यवाद अदा किया है और चादर समेटी। रात अधिक होने के कारण तुरंत नींद आ गई।

सुबह 7:00 बजे नींद खुली तो काफी उजाला हो गया था। ट्रेन और भी विलंब से चल रही थी। मैं साइड की बर्थ छोड़कर सामने की बर्थ में आ गई। वह महिला भी उठ चुकी थी और उन्होंने उसी आकर्षक मुस्कुराहट के साथ मेरा स्वागत किया। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। उन्होंने बताया कि उनका नाम विनीत मिश्रा है और वह लखनऊ की रहने वाली हैं। उनके पति स्वास्थ्य विभाग में सीएमओ के पद से रिटायर हुए हैं। वह किसी एनजीओ के फंक्शन में रानीखेत जा रही थी। जो उनकी बेटी की दोस्त की थी। उनकी बेटी तब पैरिस में थी। मैंने भी अपना परिचय दिया कि मैं गीता कांडपाल हूं और उत्तराखंड प्रशासन अकादमी नैनीताल में संकाय के पद पर हूं। एक प्रेजेंटेशन के सिलसिले में लखनऊ गई थी। ट्रेन चूंकि लगभग 4 घण्टे लेट थी। हमने चाय बिस्किट मंगाया और फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। घर परिवार की औपचारिक बातों के बाद उन्होंने बताया कि वह कविता लिखने में बहुत रुचि रखती हैं। उन्होंने अपनी कई रचनाएं लिखकर रखी हैं। लेकिन किसी को कभी सुनाई नहीं। पति की व्यस्तता, बच्चों की पढ़ाई लिखाई के बीच कभी समय मिलने पर वह लिखती रही हैं। क्योंकिअब बच्चे बड़े हो गए हैं। सेटल हो गए हैं सो अब वह आराम से लिख सकती हैं। मेरे आग्रह पर उन्होंने अपने कुछ रचनाएं मुझे सुनाई। सुनकर मैं दंग रह गई। बहुत ही सुंदर और तथ्य पूर्ण कविताएं थीं। जो कहीं नहीं छपने के कारण सिर्फ उनकी अलमारी में धूल खा रही थीं।

क्योंकि समय बहुत था हमारे पास, मैंने और कविताएं सुनाने का आग्रह किया। वह बोली, “क्या वह इतना अच्छा लिखती हैं?” मैंने बोला, “अच्छा मैडम?? आप गजब लिखती हैं!! और इन कविताओं को दुनिया के सामने आना चाहिए।” वह मेरा हाथ पकड़ कर बोली, “मुझे दीदी बोलो गीता! मुझे तुमसे एक अलग अपनापन मिल रहा है।” वह कुछ तनाव में भी थी अपने अकेलेपन से। इसीलिए बेटी ने उनका टिकट करवा कर पहाड़ों में जाने को बोला था। मैं human resource development की कई क्लासेस अपने संस्थान में करती रहती थी जिसमें तनाव प्रबंधन भी एक विषय था। बस मेरा प्रशिक्षक मन जागृत हो गया। मैंने उनको कुछ बातों की जानकारी दी। Jho – Hari Window का जिक्र भी किया। जो उन्हें बहुत पसंद आया। उन्होंने मुझे वह विंडो ड्रॉ करके समझाने को कहा। Jho – Hari Window personality development का भी एक अच्छा टूल है।

4 घंटे पता नहीं कहां चले गए उनके साथ बातें करते हुए। हल्द्वानी आ गया। मुझे हल्द्वानी रुकना था और उनकी टैक्सी आ चुकी थी रानीखेत जाने के लिए। हमने एक दूसरे का नंबर लिया और फिर उन्होंने मुझसे वादा किया कि वह अपनी कविताएं सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचाएंगी। हम फिर मिलने का वादा कर अपने-अपने गंतव्य को चले गए। उसके बाद कई बार फोन से बात हुई। वह हमेशा अपने बच्चों के लिए मुझ राय लेती और बोलती कि तुम एक अच्छी काउंसलर हो। तुम्हारी बातें दिल तक जाती हैं और एक नया जोश भर देती हैं।

कुछ दिन बाद फेसबुक में मैंने जब उनकी कविता देखी, खुशी से मेरा मन नाच उठा। बहुत ही अच्छी कविता शेयर की थी उन्होंने। फिर लगातार यह सिलसिला चलता रहा। आज विनीता दी लखनऊ की ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी अपनी कविताओं एवं रचनाओं के माध्यम से जानी जाती हैं। भगवान राम कथा और उन पर कविताएं इतनी सारगर्भित होती हैं कि हृदय की गहराइयों में उतर जाती हैं प्रकृति से जुड़ी, मानव जीवन से जुड़ी, महिलाओं के दर्द को समेटती उनकी कविताएं बहुत ही मर्मस्पर्शी होती हैं। विनीता दी एक अच्छी अदाकारा भी हैं और बहुत ही सुंदर नृत्य जानती हैं। जितना भी समय गुजरता जा रहा है उनकी नई-नई प्रतिभाएं हमारे सामने आती जा रही हैं।

और सबसे बड़ी बात विनीता दी अपनी प्रतिभा को दुनिया तक लाने का श्रेय मुझे भी देती हैं। कला उनके पास थी, पहचाना मैंने और दुनिया को उसका लाभ मिल रहा है। वरना इतनी अच्छी कवियत्री की सुंदर कविताएं अलमारी में ही बंद रह जाती। दी आप खूब तरक्की करो। दुनिया में अपनी कविताओं से लोगों को जागृत करो और हमेशा स्वस्थ रहो, खुश रहो।

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