कामकाजी माहिलाओं की अनकही अनसुनी बातें


महिला सशक्तिकरण के नाम 1951 से सभी सरकारों ने अपने हिस्से के वोट आसानी से प्राप्त किये और आज तक भी यही कहानी चली आ रही. मैं ये नहीं कहती हूँ की सशक्तिकारण नहीं हुआ. बहुत हुआ आज महिलाएं काफी हद तक आगे आये है लेकिन decision making मे आज भी पुरुषों का वर्चस्व है चाहे घर हो समाज हो य़ा कार्यालाय. 10 प्रतिशत महिलाएं ही शायद decision making मे अपना योगदान दे पाती हैं.
कामकाजी महिलाओं की बात करे तो पंचायत मे 50 प्रतिशत और निकायों मैं 30 प्रतिशत का के बाबजूद पुरुषों का ही निर्णय चलता है प्रधान पति य़ा सदस्य पति. और कार्यालय मैं तो अगर महिला एकदम शीर्ष पद हैं तो ठीक है वरना तो फिर वो सभी के मास्तिषक मे महिला ही है उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनके घरवालों की है कार्यालय से उसका कोई लेना देना नहीं. शोषण सिर्फ शारीरिक हो नहीं होता मानसिक भी होता है
मुझे याद है 1998 मे अपने करियर की शुरुवात करते हूए बहुत सपने बुने कि बस दुनिया ही बदल देंगे. हुआ यूँ कि एक विश्व बैंक की परियोजना मे कम करने का अवसर मिला गांव मे काम करना था. मैं एक पर्यवेक्षक के रुप मे कार्य कर रही थी. हमारी टीम थी ज़िसमे एक टीम लीडर फिर मैं पर्यवेक्षक और मेरे बाद 3 जूनियार इंजीनियर, 2 सामुदायिक फेसिलिटेटर और हर गाव मे एक एक सामुदायिक कार्यकार्ता. हमारे पास 8 गांव थे. सभी मे काम करना होता था
मैं जिस में संस्थान के साथ कम कर रही थी वहां के निदेशक माहिला सुरक्षा के प्रति काफी संवेदनशील थे उनहोने मुझे आदेश किया था कि आपका ऑफिस मैनेजमेंट बहुत अच्छा है तो आप ऑफिस का भी ज़िम्मा ले लो और आवश्यकता के अनुसार ही फील्ड मे जाना क्योंकि हमारे के लीडर फील्ड मैं काफी एक्टिव थे.
लेकिन ये बात हमारे ज़िले के उस योजना के कार्यालय को पसंद नहीं आयी . चूँकि हमारा संस्थान काफी प्रतिष्ठित था और उन अधिकारियों से बोलने की हिम्मत नहीं थी तो वो पूरा गुस्सा मुझ पर निकालते. आये दिन ऑफिस मै आकर अपने रूतबे का रोब दिखाना मुझे बार बार फील्ड मे कम जाने के ताने देना उनकी आदत बन गई. मै चाहते हूए भी फील्ड मै नहीं जा पाती और उन के ताने सुनकर तनाव मे आ जाती. नई नई नौकारी थी ना बॉस को नारज कर सकते थीं ना पोर्टफाइलो मैनेजर को. शुरू की जॉब मे डरती भी थी.
खैर एक दिन वो सुबह सुबह 10 बजे ऑफिस आ गए अपने परियोजना की गाड़ी लेकर और बोले गीता चलो गांव जाना है आज agree to do meeting है तुम चलोगी. मै घर से बोलकर नहीं आई थी गांव बहुत दुर था. निदेशक महोदय बाहर थे. वो पूरा पता लगा कर आये थे. मैने घर को फ़ोन किया तब बेसिक फ़ोन होते थीं की गाव जा रही हूँ शाम तक लौटूँगी. क्योकि मेरे पास रात मे रुकने के कपड़े नहीं थे.
टीम रवाना हुई. एक जे ई , एक सामुदायिक कार्यकारता खुद पोर्टफोलियो मैनेजर और उनका स्टाफ. वो पूरी भडास निकालने के लिए पूरी तैयारी के साथ आये थे. रास्ते मे ताने देते रहे. फिर खाने का समय था. सभी ने तय किया की पेड की छांव मै बैठकर खाना खाते हैं . सभी ने अपना खाने का डिब्बा खोला. मेरे डिब्बे मे sandwitch देखकर वो भड़क गए बोले अगर सही मे गाव मै काम करती तो 2 रोटी और उसमे नमक का खाना होना था. शहरी लडकियां गांव मे कम करने और मेरा खाना भी खाया और खुद पराठे लाये थे .
हम आगे बढे वो रास्ता पूछने लगे और बोले कि सिर्फ गीता बताएगी. मुझे तो रस्ता पता ही नहीं जब भी आये टीम के साथ आई इतना धयान भी नहीं दिया था. मै नहीं बता पाइ औए एक डरी सहमे लड़की जैसे गर्दन झुका कर खड़ी हो गई. वो बोले जाओ उस औरत से पूछो तो घास काट रही है मै दौड कर उसके पास गई और गांव का रास्ता पूछा वो सब सुन रहे थे . वापस आते ही मुझ पर बरस गए बोले पहाड़ी मै बात क्यो नहीं की शहरी लडकियाँ गांव मै काम करेंगी. बात सही थी मुझे अपनी मे बात करनी चाहिए थी.
जैसे तैसे ताने सुनते हम गाव पहुँचे. बैठक अच्छी हुई परियोजना की जानकारी मुझे पूरी थी तो ताने नहीं मिले खुश होकर ताली बजी और गाव वाले योजना बनाने के लिए तैयार हो गए. मै भी खुश थी कि अब टाइम से घर पहुँच जाऊंगी. पर किस्मत खराब थी. जैसे ही हम लौटने को तैयार हूए पोर्टफोलियो मैनेजर बोले मैडम आप है कहाँ आ रही हैं आपको आज गाव मे ही रहना है. मै आवाक. ना कपड़े ना ब्रुश ना पेस्ट रात मे कैसे रुकु. पर वे नहीं माने. टीम के एक मेम्बर जो उसी गांव काम कर रहा था उसको साथ मे छोड़कर चलते बने और साथ ऑर्डर देते चले गए की कल सुबह अगले गांव सिमलखा मे मिलो जो उस गाव से 10से 12 किमी ढलान पर कर फिर जीप से आधे घंटे की दुरी तय कर आता था. मरता क्या ना करता. पूरी रात आखों मे कट थी.
सुबह 7 मै और मेरा साथी पैदल सीमालखां को रवाना हूए . ये दोनो गाव बेतालघाट विकास खण्ड के थे. करीब 10 बजे बेतालघाट पहुँचे. नास्ता किया फिर सीमालखां के लिए गाड़ी देखने लगे. लेकिन बहुत तनाव के कारण मेरी मासिक धर्म की डेट पहले ही आ गई. साथ मे लडका और पास मे कोई साधन नहीं. हे भगवान क्या करू. खैर पर्श मे देखा एक काफी बड़ा और मोटा रूमाल मिल गया अब शौचालय ढुढ़ना था. पर के सारे बिना पानी के. बहुत ढुढ़ने के बाद पानी मिला बाल्टी मे भरा और फिर आराम मिला.
उसके बाद एक जीप मिली दो ग्राम प्रधान शराब पिये बहस करते मिले. उसी जीप मे 12.30 बजे सीमालखां पहुँचे. साहब 1.30 बजे आये. आते ही बैठक के बारे मे पुछा. वहां के कार्यकर्ता ने बताया कि काम की अधिकता के कारण लोग नहीं आये इसलिए बैठक निरस्थ करनी पड़ी. साहब का गुस्सा सातवे आसमां पर था सबको बहुत डाठा. टार्गेट मै ही थी मुझे बुलाया और कुछ चार्ट जिनसे हम लोगो के साथ बात करन के लिए इस्तेमाल करते थे पूरे कमरे मै फैल दिये और पूछने लगे इसमे से क्या क्या किया मुझे बताओ. मैने बताया जितना आता था.
शाम को जैसे ही हम जाने के लिए गाड़ी मे बैठे मुझे बोले आप कहा जा रही हैं मैडम यही रूको और कल बैठक करके आना.
अब हद हो चुकी थी मै सीधे जाकार गाड़ी मै बैठ गई. वो रास्ते भर मुझे ताने देते रहे और सुनाते रहे. 8 बजे हम भवाली पहुँचे. मैने रिकुयेस्ट की कि का वाहन है मुझे नैनीताल तक छोड दें जाड़ों के दिन थे. पर वो महाशय मुझे 25 रुपये देकर बोलतें हैं अभी एक टूरिस्ट बस आयेगी य़ा कोई गाड़ी मिले तो चले जाना . मैने पैसे लेने से इंकार किया और बोला सर मुझे bhimtal मै किसी होटल दिला दो बहुत रात हो गई. ऊँहोने अनसुना कर गाड़ी घुमवाई और चले गए.
ये सब एक व्यक्ति जो नैनीताल के लिए गाड़ी का इंतजार कर रहा था देख रहा था. मैंने गाड़ी वालों से बात की तो अधिकतर वहां चालक पीये हूए थे. कुछ समझ नहीं आ रहा था. एक गाड़ी वाला बोला 50 रु मे गाड़ी बुक कर लो. पर अकेले जाने की हिम्मत नहीं हुई. लौट कर बस के आने का इंतजार में करने लगी. तभी वो व्यक्ति मेरे पास आया और बोला 25 -25 रू देकर चलतें हैं. कुछ चारा नहीं था रात के 9 बज रहे थे.
मै गाड़ी मै बैठ गई वो व्यक्ति मेरठ पुलिस मै काम करता था. एक अच्छा इंसान था. मुझसे बोला मै आपको उस व्यक्ति से request करते हूए देख रहा था कौन थे वो लोग मैने बोला हमारे विभाग से ही है. वो बोला इतनी मजबूरी हैं क्या नौकरी करना वरना एसे लोगो के साथ काम करना छोड़ दो.
खैर तल्लीताल पहुचते ही मैने येसे दौड लगाई जैसे लोग पी टी उषा, क्योकि मेरा घर वहां से 6 किमी था और 10.30 पर कोई रिक्शा मिलना नहीं था. 11 बजे मै घर पहुची पूरा परिवार घर के बाहर खडा था. किसी तरह बात को संभालते हूए पिताजी से ये वादा किया की अब फील्ड की जॉब नहीं करूँगी.
आज 25 26 साल के बाद भी स्तिथि वही हैं. आज भी वही घटनाएं बार बार होती हैं तरीके बदल गये हैं सब. लेकिन अब अनुभव ने उनसे निपटना सीखा दिया है.
समय मिलने पर वो किस्से भी सांझा करूँगी.
हम खुद को सशक्त मानते भर हैं पर आज भी घर मे ऑफिस मे समाज मे पुरुष का ही वर्चस्व हैं चाहे वो आपसे हर हाल मे जूनियर ही होंगे .
कामकाजी महिलाएं विचार जरूर करे.
एक संस्समरण

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